Priority Sector Lending (PSL) क्या है | प्रायॉरिटी सेक्टर लेंडिंग के बारे में जानकारी

Priority Sector Lending (PSL)

बैंकों के निर्माण का मकसद सिर्फ लोगों के पैसों की सुरक्षा या लेन-देन की व्यवस्था स्थापित करना ही नहीं है, वे देश के निर्माण में भी अपना योगदान देते हैं। प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग इसी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए है। इस प्रोजेक्ट के तहत देश और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विकास में योगदान के लिए बैंकों की हिस्सेदारी तय की गई है। इस आर्टिकल में प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। बैंकों को इसके तहत किस-किस तरह के कार्य करने होते हैं, इससे जुड़े सभी जरूरी पहलुओं को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को अंत तक पढ़ें।

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PSL के तहत लोन का एक हिस्सा देना होगा

बैंकों को प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत अपने लोन का एक हिस्सा डेवलपमेंट के लिए देना होता है। पीएसएल के तहत बैंकों को फाइनेंशियल सेक्टर की ग्रोथ को भी पक्का करना होता है। बैंकों को यह काम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के नियमों के हिसाब से करना होता है।

एनबीसी का 40 फीसदी प्रायॉरिटी सेक्टर लेंडिंग को देना जरूरी है

आरबीआई ने इसके लिए न्यूनतम सीमा तय किया है। यह बैंकों के ऑनरशिप पैटर्न के हिसाब से तय की गई है। प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर बैंकों को अपने नेट बैंक क्रेडिट यानी एनबीसी का 40 फीसदी प्रायॅरिटी सेक्टर को देता होता है। विदेशी बैंकों के लिए इस सीमा को कुछ कम कर दिया गया है। उन्हें अपने नेट बैंक क्रेडिट (एनबीसी) का 32 फीसदी ही प्रायॅरिटी सेक्टर को देना होता है।

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एनबीसी (NBC) का लक्ष्य

डॉमेस्टिक बैंकों को अपने एनबीसी का 18 प्रतिशत लोन एग्रीकल्चर और 10 प्रतिशत लोन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार या व्यक्तियों के लिए तय करना होता है। विदेशी बैंकों को इसी तरह अपने एनबीसी का 10 फीसदी हिस्सा स्मॉल स्केल इंडस्ट्री को देना होता है। आरबीआई ने इसके लिए पूरा डीटेल नोट तैयार किया है। इसके तहत एक्सपोर्ट क्रेडिट, हाउसिंग लोन, शिक्षा ऋण आदि क्षेत्रों में भी प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग की सीमा तय की गई है। बैंकों को नियमों का पालन करना होता है।

नाबार्ड के लिए बैंकों की हिस्सेदारी

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने बैंकों के लिए नियम तय किए हैं। लोकल बैंकों को प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग में कमी की भरपाई के लिए नाबार्ड के रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवेलपमेंट फंड में योगदान देना होता है। विदेशी बैंकों की हिस्सेदारी भी तय की गई है। अगर विदेशी बैंक अपना टारगेट पूरा करने में चूक जाते हैं तो उन्हें अपने हिस्से की उतनी रकम को करीब एक साल के लिए सिडबी के पास जमा करना होता है। 

रिक्वरी में देरी से टारगेट पर असर तो देना होगा NBC AND LBC को हिस्सा

पब्लिक सेक्टर के बैंक हों, लोकल या फिर प्राइवेट बैंक हों, उन्हें अपना टारगेट हर हाल में पूरा करना होता है। इसके लिए लोन की रिक्वरी में तेजी भी लाई जाती है, लेकिन कभी-कभी रकम की वसूली उचित समय पर नहीं हो पाती है, जिसकी वजह से वे अपना टारगेट मिस कर जाते हैं। बैंकों को इसकी वजह से तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हालांकि बैंकों की कोशिश यही होती है कि वे अपने हिस्से का एनबीसी प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग पर खर्च करें।

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प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग (PSL) के उद्देश्य

भारतीय रिजर्व बैंक ने लोगों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग व्यवस्था की शुरुआत की है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के गरीब किसान, माइक्रो और छोटे उद्योग, आर्थिक रूप से कमजोर परिवार वालों के लिए गृह निर्माण क्षेत्र को मजबूत करना तो है ही, उनकी शिक्षा के लिए पैसों का इंतजाम करना भी है। ये ऐसे सेक्टर हैं, जिन्हें आमतौर पर लोन नहीं मिल पाता है। यही वजह है कि इस वर्ग से जुड़े लोगों की मजबूती के लिए प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत बैंकों की जिम्मेदारी तय की गई है।

Priority Sector Lending के तहत होम लोन सीमा को बढ़ाया

आरबीआई ने प्रायॅरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत होम लोन की सीमा को बढ़ा दिया है। आरबीआई ने बैंकों को निर्देशित किया है कि वे मेट्रोपॉलिटिन सेंटर्स के लिए लोन के रूप में 35 लाख रुपये मंजूर करें। मेट्रोपॉलिटिन सेंटर्स के लिए शहर की आबादी 10 लाख या इससे ज्यादा होनी चाहिए। इससे पहले इस तरह के शहरों में रहने वालों को हाउसिंग लोन के रूप में 28 लाख रुपये तक दिए जाते थे।

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आरबीआई के तहत 25 लाख रुपये की व्यवस्था

आरबीआई ने इसी तरह उन शहरों के लिए भी लोन की सीमा तय कर दी है, जो मेट्रोपॉलिटिन सिटी में शामिल नहीं है। यानी ऐसे शहरों के लिए, जिनकी आबादी 10 लाख से कम है, बैंकों को वहां के लोगों को लोन के रूप में 25 लाख रुपये देने होंगे। आरबीआई ने हालांकि यह भी कर दिया है कि दोनों मामलों में अधिकतम लोन की सीमा 45 और 30 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यानी मेट्रोपॉलिटिन सेंटर्स के लिए लोन की अधिकतम सीमा 45 लाख और नॉन मेट्रोपॉलिटिन सेंटर के लिए अधिकतम लोन की सीमा 30 लाख कर दी गई है।

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Munendra Singh

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