सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है | PDS System Explained in Hindi (नियम व कमीया )

Public Distribution System

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों के लिए सस्ती दरों पर अनाज का वितरण किया जाता है। इसमें किसी तरह का झोल न हो, इसलिए सरकार ने इसे कानूनी जामा भी पहना दिया है। इसके लिए एफसीआई और कोटेदारों की भूमिका को भी तय किया गया है। इस आर्टिकल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS System) के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। इससे जुड़े सभी जरूरी पहलुओं को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को आखिरी तक जरूर पढ़ें।

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पीडीएस का फुल फार्म | PDS FULL FORM

पीडीएस का फुलफार्म Public Distribution System / पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है, जिसे हिंदी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है। बाद में इसके साथ पीडीएस को जोड़ दिया गया, जिसका फुलफार्म टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है, जिसे हिंदी में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है। अनाज वितरण की जिम्मेदारी एफसीआई यानी फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास है। आपदा के समय सरकार के बफर स्टॉक से भी अनाज को निकाला जा सकता है। 

PDS System की शुरुआत कब हुई थी

सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 1997 में पीडीएस यानी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत की गई। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) को इसकी जिम्मेदारी दी गई। देश के अलग-अलग राज्यों, गांवों, तहसीलों और शहरी इलाकों में मौजूद कोटेदारों तक अनाज पहुंचाने की जिम्मेदारी एफसीआई को दी गई। उसके लिए यह सुनिश्चित किया गया कि अनाज का वितरण समय पर किया जाए। इसी तरह कोटेदारों के लिए भी यह सुनिश्चित किया गया कि वह जरूरतमंदों तक इसकी सप्लाई करें।

PDS System के तहत दो भांगों में बांटे गए कार्ड धारक

पीडीएस के तहत आम लोगों को दो भांगों में बांटा गया है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर लोगों को बीपीएल कार्ड धारकों की सूचि में शामिल किया गया है, जबकि गरीबी रेखा से ऊपर जीवन गुजार रहे लोगों के लिए एपीएल कार्ड की व्यवस्था की गई। इस प्रणाली के तहत बीपीएल कार्ड धारकों के लिए न्यूनतम मूल्य पर अनाज वितरण की व्यवस्था की गई, जबकि एपीएल कार्ड धारकों के लिए भी बाजार से कम मूल्य पर अनाज वितरित किया जा रहा है। 

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पीडीएस (PDS) का उद्देश्य

जरूरी अनाज, जैसे चावल, गेहूं, दाल, सरसों का तेल, चीनी को उचित कीमतों पर दुकानों और कोटेदारों के माध्यम से उपभोक्ताओं और बीपीएल-एपीएल कार्ड धारकों तक पहुंचाने को ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है। इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए खास ख्याल रखा गया है। चूंकि बाजार में वस्तुओं के दाम में उतार-चढ़ाव की स्थिति रहती है, इसलिए बीपीएल और एपीएल कार्ड धारकों के लिए यह सुनिश्चित किया गया है कि उनके लिए आमतौर पर सरकार की तरफ से तय मूल्य पर ही अनाज का वितरण किया जाएगा।

पीडीएस (PDS) की कमियां

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के वैसे तो कई फायदे हैं और इसके तहत लोग लाभांवित भी हो रहे हैं, लेकिन कुछ मामलों में इसमें कमी भी देखी गई है। कई अध्यनों से यह भी पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर गरीबों को इसका ज्यादा फायदा नहीं मिला है। यह भी माना जाता है कि इस सिस्टम के तहत बीस फीसदी गरीबों तक ही अनाज पहुंच पा रहा है। एक्सपर्ट मानते हैं कि सरकार को इसमें और सुधार करना चाहिए। इस प्रणाली के तहत ज्यादातर गरीबों तक पहुंच बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

Public Distribution System के द्वारा सरकार का खर्च बढ़ गया

सार्जजनिक वितरण प्रणाली के तहत बाजार की तुलना में बेहद कम कीमतों पर वितरित किए जा रहे अनाजों के लिए सरकार को सब्सिडी देना पड़ रहा है। इसका असर सरकार के खजाने पर पड़ रहा है। राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1980 में 662 करोड़ रुपये की सब्सिडी मंजूर की गई थी। 1991 में यह बढ़कर 2 हजार 850 करोड़ पहुंच गई थी। इसी तरह 2010-11 में यह करीब 62 हजार करोड़ हो गई थी। जबकि 2012 में सब्सिडी के रूप में सरकार को करीब 72 हजार करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ा था।

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PDS System शहरी इलाकों में पहुंच

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सबसे ज्यादा फायदा शहरी इलाकों में रहने वालों को मिल रहा है। यहां के ज्यादातर लोग जागरूक हैं। शहर होने के नाते यहां अनाज का वितरण भी समय पर कर दिया जाता है। जबकि ग्रामीण इलाकों में अनाज वितरण की व्यवस्था ही प्रभावित हो जाती है। खासकर उन इलाकों में, जो आज भी बंजर हैं या फिर आदिवासी इलाकों में, जहां अनाज को हर महीने वितरित करना ही सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है।

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Munendra Singh

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