एनपीए क्या होता है | फुल फॉर्म | Non-Performing Asset (NPA) Explained in Hindi

Non-Performing Asset (NPA)

एनपीए क्या है… पिछले कई वर्षों से यह सवाल ज्यादातर आम लोगों के जेहन में है। अखबारों में इससे जुड़ी खबरें छपती हैं। टीवी न्यूज चैनलों पर भी एनपीए पर आधारित खबरें चलाई जाती हैं, लेकिन बावजूद इसके बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो आमतौर पर एनपीए जैसी टर्मनोलॉजी से वाकिफ नहीं है। इस आर्टिकल में एनपीए (NPA) के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। एनपीए (NPA) बढ़ने की वजह क्या है और मुख्य रूप से इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, इससे जुड़े पहलुओं को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को आखिरी तक पढ़ें।

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एनपीए का फुलफार्म | NPA FULL FORM

एनपीए का फुलफार्म “Non-Performing Asset / नॉन परफार्मिंग एसेट” है। यानी रुपये के रूप में एक ऐसा एसेट, जो जाहिरी तौर पर दिखाई तो दे रहा है, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति या कंपनी ने किसी बैंक से 5 करोड़ रुपये का ऋण लिया। अब उसे ब्याज के साथ ऋण की अदायगी करना है, लेकिन वह न तो ब्याज दे रहा है और न ही मूलधन वापस कर रहा है। एक लंबी अवधि गुजरने के बाद लोन के रूप में मंजूर की गई इस रकम को एनपीए में डाल दिया जाता है। यानी यह कहा जा सकता है कि एक ऐसा एसेट, जो लंबी अवधि के बाद जब बैंकों तक नहीं पहुंचता है तो उसे एनपीए मान लिया जाता है। 

बैंकों का एनपीए (NPA) पांच वर्षों में तेजी से बढ़ा है

बैंकों का एनपीए पिछले पांच वर्षों में तेजी के साथ बढ़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च, 2015 तक राष्ट्रीय बैंकों का एनपीए करीब 2 लाख 67 हजार करोड़ था। 2017 में यह बढ़कर करीब 6 लाख 89 हजार करोड़ हो गया था। 2019 में इसमें और बढ़ोतरी दर्ज की गई। बैंकों का एनपीए बढ़कर करीब 10 लाख करोड़ हो गया, जो बहुत बड़ी रकम मानी जाती है। यही नहीं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की 2021 की स्क्रूटनी के हिसाब से यह बढ़कर 11 लाख करोड़ पहुंच जाएगा।

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एनपीए (NPA) से बैंकों को नुकसान

एनपीए बढ़ने से बैंकों को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। यह उसी तरह है, जब किसी व्यक्ति ने जरूरत पड़ने पर अपने दोस्त को उधार के रूप में 50 हजार रुपये दे दिया था, लेकिन जब उस रकम की वापसी नहीं होती है तो फिर जाहिरी तौर पर व्यक्ति का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है। यही हाल बैंकों का है। एनपीए का मतलब ही कर्जा है। जिन लोगों ने बैंक से लोन लिया है, वह बैंकों के कर्जदार हैं। बैंक इस उम्मीद पर लोगों, पूंजीपतियों, उद्योग घरानों या छोटी-बड़ी कंपनियों को कर्जा देता है कि वह समय पर इसका ब्याज तो अदा करेंगे ही, मूल रकम भी लौटाएंगे।

एनपीए (NPA) की वसूली

एनपीए बढ़ने के बाद बैंकों के पास इसकी वसूली का अधिकार है, लेकिन यह कारगर कदम नहीं है। ज्यादातर पूंजीपति, उद्योग घराने और कंपनियां अपने एसेट की तुलना में कहीं ज्यादा लोन की रकम हासिल कर लेते हैं। डिफॉल्टर घोषित होने के बाद बैंक उनकी प्रॉपर्टी या संपत्ति सीज करता हैं, लेकिन इसकी वजह से उनकी रकम की भरपाई नहीं हो पाती है। सीजिंग के लिए भी बैंकों को आरबीआई की गाइडलाइंस और सरकार के नियमों का पालन करना होता है, जिसमें उन्हें तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस कार्रवाई में बैंकों के काफी पैसे खर्च हो जाते हैं।

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NPA बढ़ने में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत

एनपीए बढ़ने की मूल जड़ों में खुद बैंक ही हैं। बैंकों की लापरवाही और अधिकारियों की मिलीभगत की वजह से आमतौर पर एनपीए बढ़ता है। लोन की रकम जारी करने से पहले बैंकों के पास यह अधिकार है कि वह पहले ऋणकर्ताओं की संपत्ति की अच्छी तरह जांच कर लें। संपत्ति की कीमत या एसेट के आधार पर लोन के लिए पैसे जारी किए जाएं, लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। बैंक के आला अधिकारियों और जांच एजेंसियों से जुड़े लोग कई बार उद्योग घरानों, कंपिनयों और पूंजीपतियों के साथ मिलीभगत कर कम एसेट पर ज्यादा लोन मंजूर कर  लेते हैं, जिसकी वजह से उसकी भरपाई नहीं हो पाती है।

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Munendra Singh

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