बैंकों का राष्ट्रीयकरण क्या है | Nationalization of Banks in Hindi

Nationalization of Banks

बैंकों का राष्ट्रीकरण होने के बाद न सिर्फ बैंकों को, बल्कि आम लोगों को भी इसका फायदा मिला था, जो आज भी जारी है। राष्ट्रीयकरण के फैसले के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिली थी। बैंकों के अधिकार बढ़ गए थे। कर्मचारियों को भी कई तरह की राहत मिली। इस आर्टिकल में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। उसके ऐतिहासिक पहलू को भी टच किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को आखिरी तक पढ़ सकते हैं।

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14 बैंकों का राष्ट्रीकरण कब किया गया था

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई, 1969 को देश के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ था, जब किसी सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकर करने का फैसला लिया था। इसके बाद 1980 में देश के 6 और बैंकों का राष्ट्रीकरण किया गया था। यह फैसला भी इंदिरा गांधी ने ही लिया था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीयकरण होने के बाद ज्यादातर बैंकों की पहुंच देश के गरीब और आम लोगों तक आसानी से हो जाएगी।

 बैंकों के पास थी 80 फीसदी पूंजी

राष्ट्रीयकरण से पहले 14 प्राइवेट बैंकों के पास देश की 80 फीसदी पूंजी थी। सरकार को लग रहा था कि बैंक सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे हैं। यह पूंजीपतियों को सपोर्ट करने वाला सिस्टम है, जिसकी वजह से कृषि और लघु उद्योग को निवेश नहीं मिल पा रहा है। जबकि सरकार चाहती थी कि कृषि और लघु उद्योग को बढ़ावा मिले, ताकि देश के किसानों के साथ आम लोगों की जिंदगी खुशहाल बने। उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकें।

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राष्ट्रीयकरण से पहले कितने बैंक डूबे थे

देश में 1947 से लेकर 1955 के बीच छोटे-बड़े करीब 360 बैंक डूब चुके थे। बैंकों में आम लोगों जमा करोड़ों रुपये भी इसके साथ डूब गए थे। ज्यादातर बैंक लोगों के पैसे को कालाबाजारी और जमाखोरी के धंधों में लगा रहे थे। यही वजह थी कि सरकार ने भारत के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला किया था। सरकार का तर्क था कि राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों को सामाजिक विकास के काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के लिए टीम में शामिल थे बड़े चेहरे

सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के लिए एक टीम बनाई थी। समिति में खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति वीवी गिरी, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गर्वनर एलके झा, डिप्टी गवर्नर ए बख्शी, आर्थिक मामलों के सचिव आईजी पटेल, पीएम के मुख्य सचिव पीएन हासकर और वित्त मंत्रालय के उप सचिव डीएन घोष शामिल थे। उन्होंने आर्थिक मामलों की समीक्षा करने के बाद बैंकों का राष्ट्रीयकरण पर सहमति जताई थी, जिसे मंजूर कर लिया गया था।

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बैंकों का राष्ट्रीयकरण से बढ़ी बैंकों की शाखाएं

बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद शाखओं की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। 1969 में देश के अंदर बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थी, जो 1994 में बढ़कर 8 हजार हो गई थी। मौजूदा समय में देश में अलग-अलग बैंकों की करीब 10 हजार शाखाएं हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग के खाते चल रहे हैं। न सिर्फ शहरों में, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी बैंक शाखाओं की संख्या बढ़ गई है, जिसकी वजह से ज्यादातर लोग बैंकिंग सिस्टम से सीधे तौर पर जुड़ चुके हैं। शाखाओं को बढ़ाने का काम जारी है।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने से बैंकों की जमा पूंजी बढ़ी

बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद देश के आम लोगों का इनपर भरोसा बढ़ गया। उन्होंने बैंकों में तेजी के साथ खाते खुलवाने तो शुरू किए ही थे, पैसा जमा करने का सिलसिला भी चल पड़ा था। देखते ही देखते बैंकों के पास पैसा आ गया। जमापूंजी बढ़ने के बाद बैंकों ने भी कृषि क्षेत्र, छोटे उद्योग और लघु उद्योग के क्षेत्र में कर्ज बांटना शुरू कर दिया। किसानों के साथ आम लोगों को इसकी वजह से फायदा हुआ। यह सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है।

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बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े कार्य

  • नोटबंदी
  • लोन मेला
  • जनधन खाते
  • बैंकों की स्वायत्ता
  • शेयर बाजार में लिस्टेड
  • कंप्यूटरीकरण

 किन बैंकों का हुआ था राष्ट्रीकरण

भारत सरकार ने 1969 में देश के जिन 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीकरण किया था, उनमें इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, केनरा, देना, इंडियन बैंक, यूको, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, यूनाइटेड बैंक शामिल हैं। इसी तरह 1980 में आंध्र बैंक, विजया बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स, कॉरपोरेशन और सिंध एंड पंजाब बैंक का राष्ट्रीयकरण किया गया था। मौजूदा दौर में 10 बैंकों का एक-दूसरे के साथ विलय कर दिया गया है।

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Munendra Singh

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