मुद्रास्फीति (Inflation) किसे कहते हैं | Types of Inflation in Hindi (Explained)

मुद्रास्फीति (Inflation) क्या है

मुद्रास्फीति यानी महंगाई। महंगाई को ही मुद्रास्फीति कहते हैं। जब चीजों या सामान की कीमतों में उछाल आ जाए तो उसे मुद्रास्फीति कहा जाता है। इसे अलग-अलग सेवा दरों में उछाल के साथ भी जोड़कर देखा जाता है। इस आर्टिकल में मुद्रास्फीति (Inflation) के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। मुद्रास्फीति क्या है और इसका आकलन कैसे किया जाता है, इससे जुड़े पहलुओं को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आप आर्टिकल को अंत तक पढ़ें।

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मुद्रास्फीति (Inflation) की कीमत

मुद्रास्फीति आमतौर पर रुपये की कीमत पर तय होती है। अगर आप बाजार से कम पैसों में ज्यादा सामान ले आते हैं तो इसे मुद्रास्फीति नहीं कहा जाएगा। यानी इसे महंगाई का दौर नहीं कहा जाएगा। इस स्थिति में मुद्रास्फीति दर काफी कम रहती है। इसी तरह जब कोई व्यक्ति ढेर सारे पैसे लेकर बाजार जाता है और उसे इसके बदले कम सामान मिलते हैं तो इसे मुद्रास्फीति कहा जाएगा। इस स्थिति में महंगाई दर ज्यादा रहती है। कीमतों में लगातार उछाल देखने को मिलती है।

मुद्रास्फीति (Inflation) का आकलन कैसे करें

मुद्रास्फीति दर का आकलन किया जाता है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स, होलसेल प्राइस इंडेक्स या सिर्फ प्राइस इंडेक्स के जरिए मुद्रास्फीति का आकलन किया जाता है। महंगाई का आकलन वस्तुओं की तिमाही, छमाही और सालाना कीमतों के आधार पर किया जाता है। अखबारों में तिमाही मुद्रास्फीति दर, छमाही मुद्रास्फीति दर और सालाना मुद्रास्फीति दर से जुड़ी रिपोर्ट छापी जाती हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले साल अगर किसी सामान की कीमत 100 रुपये थी और एक साल के बाद उसी वस्तु की कीमत 110 रुपये पहुंच गई तो इस स्थिति में मुद्रास्फीति दर 10 फीसदी मानी जाती है।

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मुद्रास्फीति के लिए किन वस्तुओं को शामिल किया जाता है

मुद्रास्फीति दर तय करने के लिए जहां एक मानक बनाया गया है, वहीं इसके लिए वस्तुओं को भी शॉटलिस्ट किया गया है। खाने-पीने के सामान यानी खाद्य पदार्थ, ईंधन, जिसमें मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल की कीमतें शामिल हैं, धातू जिसमें निर्माण सामग्रियों को शामिल किया गया है और मूर्त संपत्ति की कीमतों में उतार-चढ़ाव के साथ मुद्रास्फीति दर तय की जाती है। इसी तरह वित्तीय संपत्ति, जैसे स्टॉक बॉंड, मनोरंजन, स्वास्थ्य, श्रम सेवाओं से जुड़ी दरों में इजाफा होने के बाद महंगाई का आकलन किया जाता है। यानी इन चीजों की बढ़ती-घटती कीमतों को मुख्य रूप से महंगाई और सस्ताई के साथ जोड़कर देखा जाता है।

मुद्रास्फीति (Inflation) से महंगाई का फायदा

चीजों की बढ़ती कीमतों का फायदा भी मिलता है। खासकर उत्पादक वर्ग के लिए यह लाभाकरी होता है। उद्योगपति, व्यापारी, कृषक, निवेशकों को महंगाई का फायदा मिलता है। इसी तरह उन लोगों को भी फायदा मिलता है, जो कर्जदार होते हैं। सस्ताई के दौर में कर्ज की रकम की अहमियत ज्यादा होती है, जबकि महंगाई के दौर में इसकी वैल्यू कम हो जाती है। लोगों को संसाधन के हिसाब से ज्यादा पैसे मिलते हैं, जिसकी वजह से लोगों के लिए कर्ज की अदायगी करना आसान हो जाता है। इसी तरह व्यापार बढ़ने से शेयर होल्डर्स के पैसों की अहमियत भी बढ़ जाती है। उनका मुनाफा बढ़ जाता है।

मुद्रास्फीति की वजह से आम लोगों का नुकसान

कीमतों में सामान्य स्तर पर वृद्धि से मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण जरूरी वस्तुएं महंगी हो जाती है, जिसका सीधा असर आम और गरीब लोगों पर पड़ता है। निर्यात महंगा हो जाता है। व्यक्तियों के क्रय शक्ति भी कम हो जाती है। बजट का एक हिस्सा ब्याज की अदायगी पर खर्च हो जाता है। चीजों की बढ़ती हुई कीमतों के लिहाज से कर्मचारियों की सैलरी नहीं बढ़ती है। मेहनत-मजदूरी करने वालों पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। समाज में आर्थिक गैर बराबरी और द्वेष की भावना पैदा होने लगती है, जिसके बाद दूसरी कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।

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महंगाई के मुख्य कारण

महंगाई बढ़ने के कई मुख्य कारण हैं। इसको मुख्य रूप से डिमांड और सप्लाई के फार्मूले के साथ समझा जाता है। डिमांड और सप्लाई के बीच पैदा हुए बड़े अंतर की वजह से ही महंगाई बढ़ती है। अगर किसी वस्तु या उदाहरण के तौर पर आलू की डिमांड ज्यादा है, लेकिन उसकी पैदावार कम है या किसी वजह से सामान्य सप्लाई नहीं हो सकी है तो इसकी कीमत में बढ़ोतरी लाजमी है। महंगाई का दूसरा कारण प्रोडक्शन में कमी आना है। अगर किसी वस्तु का निर्माण नियमित ढंग से नहीं हो पा रहा है और बाजार में उसकी डिमांड बनी हुई है तो उसकी कीमतों में उछाल आएगा।

मुद्रास्फीति से चीजें क्यों होती हैं सस्ती

इसको भी डिमांड एंड सप्लाई के फार्मूल के साथ समझा जा सकता है। एक वस्तु, जिसकी बाजार में ज्यादा डिमांड नहीं है, लेकिन उसकी पैदावार ज्यादा है, तो रेट में कमी आएगी। उदाहरण के तौर पर अगर किसी सीजन में प्याज की पैदावार उम्मीद से ज्यादा हो गई है और उस हिसाब से बाजार में उसकी डिमांड नहीं है तो प्याज के दाम निश्चित तौर पर कम हो जाएंगे। कभी-कभी होता यह है कि पैदावार ज्यादा होने के बाद प्याज को बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट कर दिया जाता है, जिसकी वजह से घरेलू बाजार में उसकी कमी हो जाती है। इस सूरत में पैदावार ज्यादा होने के बाद भी उसके रेट में उछाल देखने को मिल सकता है।

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 डिमांड एंड सप्लाई में संतुलन जरूरी है

बाजार में स्थिरता तभी आती है, जब चीजों की डिमांड और सप्लाई में संतुलन होता है। यानी जिस किसी वस्तु की डिमांड है, उसके लिहाज से उसकी पैदावार भी ज्यादा है तो उसके दाम में स्थिरता देखने को मिलती है। बाजार में संतुलन बना रहता है और इस स्थिति में मुद्रास्फीति दर में इजाफा भी नहीं होता है। सरकारों की कोशिश यही होती है कि वह डिमांड और सप्लाई के बीच संतुलन बनाने का काम करें, ताकि लोगों को महंगाई से राहत मिल सके। साथ ही प्रोडक्शन क्षेत्र, कृषि और व्यापार क्षेत्र से जुड़े लोग भी इसका बेजा फायदा न उठा सकें।

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Munendra Singh

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