वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) क्या है | वित्तीय समावेशन के उद्देश्य की जानकारी

Financial Inclusion

वित्तीय समावेशन को आमतौर पर बैंकों से जोड़कर देखा जाता है। बैंकों की पहुंच आम लोगों तक हो सके, इसके लिए भारत में वित्तीय समावेशन की जरूरत थी, जिसे पूरा किया गया है। वित्तीय समावेशन के बाद बैंकों का दायरा बढ़ा है। उनकी पहुंच ग्रामीण इलाकों तक हुई है, जिसका फायदा लोगों को मिल रहा है। उनके लिए ऋण की व्यवस्था भी की जा रही है। इस आर्टिकल में वित्तीय समावेशन के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। इसके उद्देश्य और लोगों को इससे मिलने वाले फायदे से जुड़े पहलुओं को भी विस्तारित किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को अंत तक पढ़ें।

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वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की पहल

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2005 में इसकी जरूरत को महसूस किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुझाव पर आरबीआई ने इस प्रणाली को लागू किया था। बैंकों को निर्देश दिए गए थे कि वे अपनी पहुंच आम लोगों तक बनाएं। ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में शाखाएं खोली जाएं, ताकि गांव के लोग भी बैंकों से सीधे जुड़ सकें। बड़ी संख्या में लोगों के खाते खोलने के निर्देश भी दिए गए थे। डिजिटल प्रोग्राम को बढ़ाने की बात की गई थी, ताकि लोगों को बैंकिंग सिस्टम में आए बिना ही इसके ज्यादातर फायदे आसानी से मिल सके।

आरबीआई (RBI) की गाइडलाइंस

भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर वाई वेणुगोपाल रेड्डी ने इसके लिए गाइडलाइंस जारी की थी। बैंकों को निर्देश दिया गया था कि वे शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में बड़ी संख्या में एटीएम लगाएं। ऐसे एटीएम भी लगाए जाएं, जहां दोनों तरह के लेन-देन की सुविधा मिल सके। यानी एक ही जगह से पैसे निकालने और जमा करने की सुविधा ग्राहकों को मिल सके। आरबीआई की गाइडलाइंस पर अमल करते हुए बैंकों ने 2005-2015 के बीच बड़ी संख्या में एटीएम लगाए थे।

आरबीआई ने कहा मिनिमम बैलेंस पर रोक

आरबीआई ने यह भी साफ कर दिया था कि बैंक अपने यहां मिनिमम यानी न्यूनतम शेष राशि व्यवस्था को लागू करें। खाताधारकों के लिए जीरो बैलेंस पर अकाउंट खोले जाएं और खाता शुरू होने के बाद उन्हें मिनिमम बैलेंस जैसी पाबंदी से दूर रखा जाए। यह व्यवस्था देश के सभी बैंकों और सभी तरह के खाताधारकों के लिए शुरू की गई थी। निजी बैंकों को भी इस दायरे में लाया गया था। ज्यादातर प्राइवेट बैंकों ने अपने यहां न्यूनतम बैलेंस की व्यवस्था को समाप्त भी कर दिया था, लेकिन 2014 के बाद भारतीय स्टेट बैंक सहित ज्यादातर बैंकों में यह व्यवस्था फिर से शुरू हो गई है।

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वित्तीस समावेशन के तहत खाता संख्या में बढ़ोतरी

वित्तीस समावेशन के बाद बैंकिंग सिस्टम में न सिर्फ सुधार आया, बल्कि उनकी पहुंच आम लोगों तक हो गई है। आरबीआई ने इसके लिए बैंकों को सलाह दी थी कि वह अपने यहां ज्यादा से ज्यादा लोगों के खाते खोलें। उनके लिए बैंकिंग सुविधा मुहैया करें। इलेक्ट्रानिक भुगतान चैनल जैसी व्यवस्था को बढ़ाएं, ताकि लोगों को घर बैठे बैंकिंग सुविधा हासिल हो सके। प्रधानमंत्री जनधन खाता योजना के तहत देश में 50 करोड़ से ज्यादा नए खाते खोले गए, जिससे आम लोगों को काफी फायदा हुआ। खासकर उन लोगों को, जो ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

वित्तीस समावेशन से ऋण की सुविधा में आसानी

आरबीआई ने इसी तरह बैंकों के लिए लोन जारी करने की सीमा भी र्निधारित की थी। बैंकों को निर्देश दिया गया था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए ऋण की व्यवस्था की जाए। लघु उद्योग हो, कुटीर उद्योग या फिर स्वरोजगार से जुड़ी योजनाएं, इनके तहत लोगों को बड़े पैमाने पर ऋण बांटे जाएं। बैंकों के गठन का मकसद देश की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना तो है ही, आम लोगों के लिए धन मुहैया कराना भी है, ताकि वे रोजगार, शिक्षा के साथ दूसरी सभी जायज जरूरतें पूरी कर सकें। वित्तीय समावेशन के बाद बैंकों ने ऋण देने के मामले में सराहनीय कार्य किए हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत भी बड़े पैमाने पर ऋण बांटे गए।

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वित्तीय समावेशन के तहत एनजीओ, माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का उपयोग

आरबीआई ने बैंकों को वित्तीय समावेशन के उद्देशों पर अमल करने के साथ मौजूदा कार्य प्रणाली की समीक्षा करने का निर्देश भी दिया है। यही नहीं, बैंकों से कहा गया है कि वे नॉन गवर्नमेंट आर्गनाइजेशन (एनजीओ), माइक्रोफाइनेंस संस्थानों और एसएचजी का बेहतर ढंग से उपयोग करें। इसी तरह सिविल सोसाइटी संगठनों का उपयोग करने की हिदायत भी दी गई है। आरबीआई का मानना है कि इस तरह के संगठनों का उपयोग और उनके लिए किए गए बेहतर कार्यों की वजह से न सिर्फ रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं, बल्कि देश की प्रोडक्शन क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।

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Munendra Singh

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