ऋण पत्र या Bond (बॉन्ड) क्या होता है | ऋण पत्र की परिभाषा | विशेषताएं

ऋण पत्र या बांड (Bond) क्या है

अगर आप शेयर मार्केट में दिलचस्पी रखते हैं या पैसे लगाते हैं तो आपको ऋण पत्र यानी बांड की जानकारी होनी चाहिए। कारपोरेट और सरकारी बांड में अंतर क्या है, निवेशकों को ऋण पत्र खरीदने पर ब्याज कितना मिलेगा? इससे जुड़े तथ्यों की जानकारी भी होनी चाहिए। इस आर्टिकल में ऋण पत्र के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। पत्र की समय सीमा क्या है, इन्हें खरीदने के लिए किस तरह की शर्तों को पूरा करना होता है, इससे जुड़े पहलु को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को आखिरी तक पढ़ें ।

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बांड (Bond) प्रमाणपत्र किसे कहते है

ऋण पत्र या बांड को एक तरह का प्रमाणपत्र या उधार पत्र भी कहा जाता है। कंपनियां आम लोगों के लिए बांड जारी करती हैं। कंपनियां बांड के बदले निवेशकों को ब्याज देती हैं। ब्याज की दरें कई बार बैंकों की ब्याज दरों से ज्यादा होती है, जिसकी वजह से निवेशक बैंकों में फिक्सड डिपॉजिट करने की बजाय बांड खरीद लेते हैं। हालांकि यह हालात पर निर्भर होता है। कंपनियों को जब उधार के रूप में ज्यादा पैसों की जरूरत होती है, तो वे निवेशकों को लुभाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ा देती हैं।

कूपन किसे कहते हैं

बांड के बदले निवेशकों को मिलने वाले ब्याज को कूपन कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर कंपनी ने एक लाख रुपये का एक बांड जारी किया है और उसका कूपन 7 फीसदी है तो इसका मतलब यह है कि कंपनियां लोगों को 7 फीसदी के हिसाब से ब्याज की रकम अदा करेगी। निवेशकों को इस तरह बांड के बदले एक साल में ब्याज के रूप में 7 हजार रुपये मिलते हैं। यही वजह है कि ऋण पत्र या बांड को फिक्सड इनकम सिक्यूरिटीज भी कहा जाता है।

बांड (Bond) की समय-सीमा

ऋण पत्र या बांड की समय-सीमा भी होती है। कंपनियां बांड जारी करते वक्त उसकी समय-सीमा भी निर्धारित करती हैं। बांड आमतौर पर 1 साल से लेकर 10 साल तक के होते हैं। अगर किसी बांड की समय-सीमा 5 साल हैं तो कंपनियां निवेशकों को इसके बदले पांच साल तक ब्याज देती रहेंगी। निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद कंपनियां बांड को वापस ले लेती हैं। इसके बाद ऋण पत्र या बांड की मूल रकम को रिटर्न के साथ निवेशक को वापस कर दी जाती है।

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बांड (Bond) को कैसे खरीद और बेच

निवेशक बांड को ओपन मार्केट में खरीद और बेच सकते हैं। यह सब बांड वैल्यू पर निर्भर है। अगर किसी व्यक्ति ने सस्ता बांड खरीदा है और कुछ समय के बाद रेट, रिटर्न या ब्याज दरें बढ़ जाती हैं तो मुनाफे के साथ इसे दूसरे व्यक्ति को बेचा जा सकता है। कंपनियां अपनी आर्थिक या कारोबारी स्थिति को देखते हुए बांड की टर्म एंड कंडीशन में बदलाव करती रहती हैं, जिसकी वजह से निवेशकों को बीच-बीच में इसका फायदा मिलता है। मेच्यूरिटी के समय मिलने वाली अंतिम राशि को “यील्ड टू मैच्यूरिटी” कहा जाता है।

वित्तीय संस्थाओं की बांड (Bond) वैल्यू

निवेशक बांड खरीदते समय कंपनियों की स्थिति, पहचान, क्रेडिबिलिटी, पिछला रिकार्ड भी देखते हैं। कॉरपोरेट सेक्टर में आमतौर पर उन कंपनियों के बांड खरीदे जाते हैं, जिनका ट्रैक रिकार्ड अच्छा रहता है। बावजूद इसके वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी बांड की वैल्यू ज्यादा होती है। बैंक भी ऋण पत्रों को जारी करते हैं। निवेशक बड़ी संख्या में बैंकों द्वारा जारी बांड को खरीदते हैं। चूंकि राष्ट्रीयकृत बैंकों की क्रेडिबिलिटी कंपनियों से कहीं ज्यादा होती है, इसलिए निवेशक उनपर भरोसा करते हैं।

बांड के लिए जरूरी फैक्ट्स

  • निवेशक परिवर्तनीय पॉलिसी के रूप में बांड को इक्विटी के रूप में बदल सकते हैं। इस तरह बांड निवेशकों को इक्विटी शेयर में बदलने का विकल्प देते हैं।
  • कंपनियां शून्य कूपन बांड भी जारी करती हैं। यह बांड बड़ी छूट पर जारी किया जाता है। जबकि फेस वैल्यू पर भुगतान किया जाता है।
  • लंबी अवधि के लिए निवेश करने वालों के लिए टैक्स सेविंग बांड भी जारी किए जाते हैं। यह एक तरह का कर मुक्त बांड है। इसपर टैक्स नहीं है।
  • कारपोरेशन बांड भी जारी किए जाते हैं। निगम या कारपोरेशन बांड के जरिए निवेशकों को निश्चित अवधि के लिए ब्याज देता है।

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डीप डिस्काउंट बांड

दरअसल बांड कई प्रकार के होते हैं। इसमें डीप डिस्काउंट बांड भी शामिल हैं। यह फेस वैल्यू से कम मूल्य पर जारी किए जाते हैं। मेच्यूरिटी अवधि पूरी होने के बाद बांड विक्रेता को अंकित मूल्य पर भुगतान किया जाता है। इसी तरह पब्लिक सेक्टर के उपक्रम बांड भी होते हैं। यह पब्लिक सेक्टर कंपनियों द्वारा जारी किए जाते हैं। इनकी मेच्यूरिटी आमतौर पर 5 से 10 साल के बीच होती है।

सरकारी बांड (Bond) क्या है

सरकार भी समय-समय पर बांड जारी करती रही है। केंद्र सरकार द्वारा जारी किसान विकास पत्र भी एक तरह का बांड ही है। सरकार आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए बांड पर ब्याज दर तय करती है। आमतौर पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी बांड पर बैंकों और किसी भी वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी बांड की तुलना में कम ब्याज दिए जाते हैं। चूंकि लोगों का सरकार पर भरोसा होता है, इसलिए बड़ी संख्या में बांड खरीद लिए जाते हैं। सरकारी बांड पर किसी तरह का जोखिम नहीं होता है।

 सरकारी बांड (Bond) की अवधि

सरकार द्वारा जारी बांड की अवधि आमतौर पर 1 से 30 साल तक हो सकती है। खास बात यह है कि फिक्सड कूपन बांड के बदले ब्याज का भुगतान छमाही स्तर पर किया जाता है। ब्याज दरें बाजार पर निर्भर रहती हैं। इन्हें नीलामी प्रक्रिया के जरिए तय किया जाता है। यील्ड बढ़ने पर बांड की कीमतें कम होती हैं। इसी तरह यील्ड घटने पर बांड की कीमतों में इजाफा हो जाता है। सरकार द्वारा बांड जारी करने की प्रकिया को आमतौर पर राजकोषीय घाटा पूरा करने के रूप में देखा जाता है।

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Munendra Singh

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