Bad bank (बैड बैंक) क्या है | What is Bad Bank Explained in Hindi

बैड बैंक (Bad Bank) क्या होता है

बैड बैंक एक विचार है। इंडियन बैंक एसोसिएशन ने इस विचार को अमल में लाने के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा है। सरकार से बैड बैंक बनाने की मांग की गई है। बैंक एसोसिएशन का तर्क है कि बैड बैंक की स्थापना के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को बूस्ट-अप मिलेगा। यानी यह बैड बैंक वास्तव में गुड बैंक की तरह काम करेगा। अब सवाल यह है कि बैड बैंक किसी के लिए गुड कैसे हो सकते हैं? इसको समझाने के लिए इस आर्टिकल को विस्तार से लिखा जा रहा है। बैड बैंक के काम, उनकी भूमिका और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा, इससे जुड़े पहलुओं को भी साझा किया जाएगा। पूरी जानकारी हासिल करने के लिए आर्टिकल को आखिरी तक जरूर पढ़ें।

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आरबीआई द्वारा वित्त मंत्रालय को भेजा प्रस्ताव

इंडियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और वित्त मंत्रालय को प्रस्ताव भेजकर बैड बैंक बनाने की मांग की है। आईबीए ने सरकार से इसके लिए 10 हजार करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी की मांग भी की है। प्रस्ताव 12 मई, 2020 को भेजा गया है, लेकिन सरकार ने फिलहाल इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि अंदरखाने में बैड बैंक बनाने को मंजूरी दिए जाने की बात चल रही है। इसके लिए आरबीआई और वित्त मंत्रालय के विशेषज्ञों से मशविरा किया जा रहा है।  

बैड लोन यानी फंसे हुए कर्ज को खरीदेगा

बैड बैंक थर्ड पार्टी की तरह काम करेगा। यह बैंकों के बैड लोन यानी फंसे हुए कर्ज को खरीदकर खुद वसूली करेगा। बैड बैंक इसके लिए अपना स्ट्रक्चर तैयार करेगा। भारत के कई बड़े शहरों में ब्रांच खोली जाएगी। मुंबई या फिर दिल्ली में हेड ऑफिस हो सकता है। इसके लिए कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी। यही नहीं, बैड बैंक को राष्ट्रीयकृत बैंक का दर्जा भी दिया जाएगा। एनपीए के रूप में फंसे हुए कर्ज की वसूली से होने वाले फायदे से बैंक का काम-काज चलेगा। सरकार इसके लिए बीच-बीच में बैड बैंक की वित्तीय मदद भी कर सकती है।

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बैड बैंक के जरिये दूसरे बैंकों का फायदा

बैड बैंक की वजह से दूसरे सभी बैंकों को फायदा मिलेगा। बैंक अपना कर्ज बेचकर बहीखाता क्लियर कर सकेंगे। दूसरा फायदा यह होगा कि बैड लोन के रूप में फंसे कर्ज की भरपाई भी हो जाएगी। बैड बैंक उन्हें इसके लिए पैसे देगा, जिसकी वजह से उनकी वित्तीय स्थिति ठीक हो जाएगी। बैंक बाजार में नए रूप में आएंगे, जिसका फायदा आम ग्राहकों को भी मिलेगा। बैड लोन क्लियर होने के बाद निवेशक या उद्योग घराने के लोग नए सिरे से लोन के लिए आवेदन कर सकेंगे। आम ग्राहकों को भी आसानी के साथ लोन मिल जाएगा, जिसका इस्तेमाल कारोबार को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

बैड लोन या एनपीए क्या है

बैंकों द्वारा छोटी-बड़ी कंपनियों, शिक्षण संस्थानों और उद्योग घरानों के लिए लोन के रूप में करोड़ों-अरबों रुपये जारी करते हैं। लोन अदा करने की मियाद और किस्त भी तय की जाती है, लेकिन जब मियाद गुजरने के बाद लोन की अदायगी नहीं होती है। किस्तों के रूप में भी लोन अदा करने के सिलसिले को रोक दिया जाता है, तो फिर कर्ज लेने वाली कंपनियों और उद्योग घरानों को डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाता है। इसके साथ फंसे हुए कर्ज को बैड लोन का दर्जा देते हुए उसे एनपीए का हिस्सा मान लिया जाता है। इसके बाद लोन की भरपाई के लिए नीलामी की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

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भारत का एनपीए कितना है

भारत में करीब 10 लाख करोड़ रुपये नॉन पर्फार्मिंग एसेट (इनपीए) का हिस्सा बन चुका है। 2014 में करीब तीन लाख करोड़ रुपये का एनपीए था, जबकि गुजरे छह सालों में यह बढ़कर दस लाख करोड़ पहुंच गया है। यानी इस दौरान एनपीए के रूप में करीब सात लाख करोड़ रुपये बढ़ गए हैं, जो बैंकों के लिए चिंता का विषय है। सरकार की चिंता भी बढ़ गई है। अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ा है। आम लोगों को भी इसकी मार झेलना पड़ रहा है। उन्हें छोटे के लिए लोन के लिए भी बैंकों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

विलफुल डिफॉल्टर किस कहते हैं

विलफुल डिफॉल्टर उन कर्जदारों को कहते हैं, जो सक्षम यानी हैसियतदार होने के बाद भी लोन की रकम अदा नहीं करते हैं। यानी सक्षम होने के बाद भी जानबूझकर लोन की रकम अदा न करने वाले कर्जदारों को ही विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है। भारत में विलफुल डिफॉल्टरों की बड़ी संख्या है। बैंकों को इनकी वजह से बड़े नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। उनका पैसा फंस चुका है, जिसकी भरपाई आमतौर पर संपत्ति की नीलामी के बाद भी नहीं हो पाती है।

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बट्टा खाता क्या है

बैंकों को जब पता चल जाता है कि कर्ज के रूप में जारी की गई राशि को किसी भी कीमत पर वसूल नहीं किया जा सकता है तो फिर इसे राइट ऑफ कर दिया जाता है। कर्ज माफ करने की प्रक्रिया को राइट ऑफ कहा जाता है। राइट ऑफ होने के बाद बैंक इन पैसों को बट्टा खाते में डाल देते हैं। यानी यह मान लिया जाता है कि इन पैसों का बट्टा लग चुका है। यह प्रक्रिया भी आरबीआई के नियम मुताबिक ही की जाती है। सरकार इस मामले में आमतौर पर हस्तक्षेप करने से बचती है।

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बैड बैंक की जरूरत

भारत में बढ़ते हुए एनपीए को ध्यान में रखकर ही बैड बैंक बनाने की मांग की जा रही है। विलफुल डिफॉल्टर की बढ़ती संख्या, राइट ऑफ और बट्टा खाते के बढ़ते बोझ के कारण बैड बैंक की भूमिका बढ़ सकती है। बैड बैंक के पास सिर्फ एक काम होगा, जिसका संबंध पूरी तरह से कर्ज वसूली के साथ है। बैड बैंक अपनी पूरी ताकत के साथ कर्ज की वसूली करेंगे, जिसकी वजह से डिफॉल्टर और विलफुल डिफॉल्टर, दोनों की परेशानी बढ़ सकती है। उन्हें कर्ज की अदायगी के लिए आसानी के साथ मजबूर किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो फिर यह भारतीय अर्थव्यव्सथा के लिए अच्छा माना जाएगा, जिसकी उम्मीद भी की जा रही है।

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Munendra Singh

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